मंगलवार, 28 सितंबर 2010

९.


ये जीवन एक साधना हैइसे आप एक नियमित दिनचर्या बना कर , एक उद्देश्य को सामने रख कर जियेंअपने अन्दर अच्छे गुण पैदा करें , पुण्य कार्य करें , धर्म के रास्ते चलते हुए अपने दुःख के दिनों को धीरज के रास्ते बीतते हुए देखें

सुख-दुख ईश्वर के अधीन है । जीवन अवधि , सुख दुख , धन , विद्या मनुष्य के जन्म से पहले ही निश्चित होता है ; इसलिए तो इनके बारे में चिन्ता करनी चाहिए और भटकना चाहिएफिर भी सब कुछ भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ देना चाहिए । ' कर्मण्ये वाधिकारस्ते ' को ध्यान में रखते हुए सदा कर्म करते रहना चाहिए


अब जो बात मैं कहने जा रही हूँ वो जिन्दगी में कभी अवसाद को आने ही नहीं देगी | आप सिर्फ ये शरीर नहीं हैं , बल्कि एक बड़ी शक्ति से अलग होकर आई हुई प्रकाश पुँज आत्मा हैं | जिस तरह हम प्रार्थना करके सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त करते हैं , उसी तरह हम ऊर्जा को दूसरी आत्माओं को भी वितरित कर सकते हैं | मन के अन्दर इतनी ताकत है कि किसी भी गिरते हुए मन को सँभाल ले | बाहर जो गुजर रहें हैं वो हालात हैं , गुजर जायेंगे , आप अपने अन्दर उन्हें गहरा न उतारें , आपको तो सिर्फ ये देखना है कि ऐसे में आप कितने विवेक-पूर्ण निर्णय लेकर अपने आप को जीतते हैं |
कहते हैं कि प्रकृति न्याय करती है जो कभी-कभी इन खुली आँखों से नहीं भी नजर आता ; मगर आप ख्याल करें कि जब-जब आपने गुस्सा किया तो गुस्सा करने से पहले और बाद में आप कितना कुढ़े ? आपने कितनी ऊर्जा गँवाई , कितनी शांति खोई और कितने दिन दुश्मन सोते जागते आपकी आँखों के सामने रहा ? ये न्याय तो ' इस हाथ दे और इस हाथ ले ' वाला हो गया | सोचें तो जरा , कोई खोट तो होती है ऐसे विचारों और क्रियाओं में जो हमें शांति से दूर ले जाती है | अच्छा होता अगर हम शान्तिपूर्ण हल ढूँढ़ते | दूसरे को परिस्थिति वश जान कर अगर हम उसे तहे-दिल से माफ़ कर सकें तो उससे बड़ी करुणा नहीं है |
परेशानियों को हमेशा सबक की तरह लें , प्रकृति आपको सिखाना चाहती है , परीक्षा लेती है , कितने खरे उतरते हो , कितने अडोल हो ? इस रोल के लिए आपको चुना गया है | आप चाहें तो टूट कर बिखर जाएँ , आप चाहें तो निखर जाएँ |
अपनी ऊर्जा को सही दिशा दें |जब आप इस अहसास से भरे होंगे कि आपके आस-पास इतने सारे लोग , सब उस सर्व-शक्तिमान के अंश हैं , सिर्फ शरीर रूपी आवरण की वजह से भटके हुए हैं ; तब आप किसी के साथ अन्याय नहीं कर पायेंगे | ' सकल ते मध्य सकल ते उदास ' जब आप अकेले हैं तब भी आपको अकेले नहीं लगेगा , दूर उसी शक्ति से लय जुड़ जायेगी ; और जब भीड़ में इतने लोगों के बीच में होंगे तब भी आप अकेले हैं क्योंकि मन की ये यात्रा तो आपको अकेले ही तय करनी है ना | अच्छा है इस यात्रा को हम सहज बनाएं , अपनी तरफ से जटिलताएं न जोड़ें | यदि हम सबको अपना समझते हुए किसी का दिल नहीं दुखाते हैं ( मजबूरी वश किसी के भले के लिए हमें कभी-कभी सख्त रवैय्या अपनाना पड़ता है , वो एक अलग बात है क्योंकि उसमें भी दूसरे की भलाई छिपी है ) , तो प्रकृति भी न्याय करती है , वो आपको शांति सब्र जैसे गुणों से भी बढ़ कर कैसे भी उपहार से नवाज सकती है | सबसे बड़ी अदालत है प्रकृति , जिस ऊर्जा को व्यर्थ गँवा रहे थे , हो सकता है उसका रुख मोड़ते ही , वही आपकी ताकत या पहचान बन कर उभरे | और हम सारी प्यासी आत्माएं अपना वजूद ही तो तलाश रहीं हैं | अब इस वजूद की तलाश में एक-दूसरे से टकराना नहीं है , सबको गले लगाना है | मैं रूहानी प्रेम की बात कर रही हूँ , साथ ही सामाजिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए हमें अपनी मर्यादाओं को नहीं भूलना है , बस यही कला सीखनी है कि मन पर दुःख का लवलेश भी न हो |
हाँ , तो अगर हम किसी का दिल नहीं दुखाते हैं ( आपका मन हर सूक्ष्म से सूक्ष्मतर बात समझता है कि कितने ही तरीकों से किसी को भी दुखाया जा सकता है ) , दुनिया की सबसे बड़ी अदालत जो आपके मन के अन्दर भी लगती है , कहिये कि आप कहाँ खड़े हैं , कटघरे में या मुस्कराते हुए इस गुजरते हुए मँच के साक्षी बन कर .....इसी का हिस्सा बने हुए ? इस अहसास के साथ ही आप जीवन जीने की कला सीख जायेंगे |
मन की नकेल अपने हाथ रखिये , चिंता और डर को हावी न होने दें | भाव और बुद्धि का सामंजस्य बिठाते हुए चलें | भाव के बिना सब नीरस है , बुद्धि के बिना सब आफत है | जो छूट गया है , जिसका आप दुख मना रहे हैं , चाहे वह महत्वाकांक्षाएं थीं या इच्छाएं , सुख-सुविधाएं या बड़े प्रिय अपने या मान-सम्मान या फिर सपने ; वो तो महज़ बैसाखियाँ थीं जो आप ने अपने जीने के लिए सहारे या कहिये बहाने की तरह खोज लिए थे , आप अपने सहारे या अपने नूर के साथ चले ही कहाँ ? आपने अपनी दुनिया भी इतनी सीमित कर ली थी , ज़रा अपनी दुनिया का दायरा बड़ा कीजिये , दूसरों का दुःख नजर आएगा तो अपना दुख छोटा नजर आएगा | सकारात्मक चिंतन ही सही दिशा दे सकता है |
दूर कहीं उस सर्व-शक्तिमान की मर्जी से लय मिला कर , मार्ग को सुगम बना कर , तकलीफों को प्रसाद समझ , कुछ कर दिखाने का अवसर समझ , हर दिन को उत्सव समझ चलना चाहिए , यही तो साधना है | आपने मस्त फ़कीर को देखा है , जब गाता है तो कायनात गाती है , जब छोड़ के चल देता है तो कुछ भी नहीं अपना | ऐसे ही हम दुखों को छोड़ दें , बोझ की तरह ढोएँ नहीं , और गायें तो ऐसे कि रोम-रोम गाये | जिन्दगी एक तपस्या है , जीवन को साध कर एक साधक की तरह जियें , बच्चे की तरह नहीं कह सकती क्योंकि हम सब बड़े हो गए हैं |
जब मन पर बोझ नहीं होगा तो ग्लानि भी नहीं होगी | पिछली गल्तियों को भूल जाइए , ' जब जागे तभी सबेरा चरितार्थ ' हो जायेगा | ये सफ़र , ये जीवन-यात्रा ही सब कुछ है , इसे सरल बना कर , इसी के सजदे में सिर झुकाइये |
उम्र के त्यौहार में रोना मना है

जाग, गले लग हँस कर

कि सोना मना है

छूट गया जो , छोड़ो यारों , अपना नहीं था

सजदे में सफ़र के , आज को सँवारा नहीं था

पकड़ते हैं उँगली बड़े-बड़े सपने

हमने तो खुद को पुकारा नहीं था

2 टिप्‍पणियां:

  1. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

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आप टिप्पणी दें न दें ,आपके दिल में मुस्कान हो ,जोश होश और प्रेरणा का जज्बा हो ,जो सदियों से बिखरती इकाइयों को जोड़ने के लिए जरुरी है ,बस वही मेरा उपहार है ....